उत्तराखंड की संस्कृति #3 :प्रमुख धार्मिक यात्राएं


कैलाश मानसरोवर यात्रा (Kailash Mansarovar Yatra)

प्रतिवर्ष जून के प्रथम सप्ताह से सितंबर के अंतिम सप्ताह तक चलनेवाली इस यात्रा का आयोजन भारतीय विदेश मंत्रालय , कुमाऊं मंडल विकास निगम तथा भारत तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के सहयोग से होता है। कैलाश मानसरोवर चीन में है अतः प्रत्येक यात्री के लिए वीजा जारी किया जाता है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा दिल्ली से प्रारंभ होकर मुरादाबाद, रामपुर, हल्द्वानी, काठगोदाम, भवाली होते हुए अल्मोड़ा पहुंचती है। अल्मोड़ा के कौसानी से बागेश्वर, चौकुड़ी, डीडीहाट होते हुए पिथौरागढ़ में धारचूला पहुंचती है। धारचूला से लगभग 160 किलोमीटर पैदल यात्रा के तहत तवाघाट, मांगती, गाला, बुंदी, गुंजी, नवीढ़ाग, लिपुलेख दर्रा होते हुए तिब्बत में प्रवेश करते है। आगे मानसरोवर तक के लिए बस व पैदल दोनों तरह से जाया जा सकता है।

एक व्यक्ति को इस यात्रा में लगभग 40 दिन लगते हैं | यात्रा के इच्छुक आवेदको को दिल्ली में विभिन्न तरह की जाँच से गुजरना पड़ता है। 2017 में इस यात्रा हेतु सिक्किम के नाथुला से एक नया रास्ता भी खुल गया है |

कैलाश शिखर की बनावट शिवलिंग की तरह है तथा पर्वत के पत्थर काले रंग के है। यात्री मानसरोवर झील में स्नान करते है, उसके बाद शिवलिंगाकार कैलाश पर्वत के चारों ओर परिक्रमा करते है, जो कि लगभग 51 किलोमीटर की है।

यहां कोई मंदिर या मूर्ति नहीं है, यात्रीयों सरोवर के किनारे मिट्टी का शिवलिंग बनाकर पूजा करते हैं । कैलाश से मानसरोवर झील की दूरी 32 किलोमीटर है।

1962 के युद्ध से पूर्व यह यात्रा बिना वीजा के होती थी। उस समय तीर्थयात्री मुख्य रूप से धारचूला की व्यासघाटी से लिपुलेख दर्रा पार कर मानसरोवर पहुचते थे। इसके अलावा पिथौरागढ़ जिले के मुन्सयारी केजोहार-घाटी के किंगरी-बिगरी दर्रे और चमोली जिले के जोशीमठ के नीती-घाटी दर्रे से भी कैलाश मानसरोवर जाते थे। युद्ध उपरांत दोनों देशों के बीच 1981 में धारचूला तहसील के व्यासघाटी के लिपुलेख दर्रे से कैलाश यात्रा शुरू करने की सहमति बनी जो बिना रुकावट के निरंतर जारी है।

नंदादेवी राज जात यात्रा

Nanda Devi Raj Jat Yatra Uttarakhand
चित्र साभार: विकिपीडिया

यह यात्रा गढ़वाल व कुमाऊँ की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। यह एक अनोखी पैदल यात्रा है, जिसमें चमोली के कांसुवा गांव के पास स्थित नौटी के नंदादेवी मंदिर से हेमकुंड तक की 208 किलोमीटर की यात्रा 19-20 दिन में पूरी की जाती है। इस यात्रा में कुमाऊँ , गढ़वाल तथा देश विदेश के लोग भी भाग लेते है।

राजजात यात्रा प्रत्येक 12 वें  वर्ष चांदपुरगढ़ी के वंशजों के कांसुवा गाँव के राजकुंवरों के नेतृत्व में आयोजित की जाती रही है। यही कारण है कि इस यात्रा को राज जात कहा जाता है।

पार्वती का विवाह कैलाशपति शंकर से हुआ था। पार्वती मंदराचल पर्वत की पुत्री थी इसलिए उत्तराखंडवासी पार्वती या नंदा देवी को अपनी विवाहित बेटी की तरह मानते है और यह यात्रा उनके विदाई के रुप में की जाती है।

जिस वर्ष यात्रा आयोजित होती है उस वर्ष कांसुवा के लोग ऐसा मानते है कि बसंत पंचमी को नंदादेवी मायके आ गई है।

नंदादेवी के विदाई यात्रा में आगे-आगे चार सींगों वाला बकरा(चौसिंघा खाड़ू ) चलता है| यात्रा के लिए निर्धारित तिथि को कांसुवा के कुंवर चौसिंगिया मेढ़े तथा रिंगाल से निर्मित सुंदर कांसुवा के पास नौटी देवी मंदिर पहुंचते हैं। वहां छंतोली राजगुरु नोटियालों को सौंप दी जाती है। उस दिन नौटी गांव में बड़ा मेला लगता है। चौसिंगिया खाडू की पीठ पर ऊन के बने दो मुहे झोले में देवी की प्रतिमा को आभूषण व भेट सजाकर रखी जाती है। और नौटी से यात्रा का प्रारंभ होकर वनाणी, बेनोली, कांसुवा होती हुई चांदपुर गढ़ी पहुचती हैं। जहां मेला लगता है और टिहरी राजपरिवार के लोग देवी की पूजा करते हैं।


वैसे तो राज जात यात्रा प्रत्येक 12 वर्षो में होती होती है, लेकिन प्राकृतिक विपदा से हुए जानमाल के नुकसान के बीच ऐतिहासिक नंदा राजजात यात्रा 14 वर्षो बाद उत्तराखंड 18 अगस्त, 2014 में शुरू हुई थी, जो 6 सितम्बर, 2014 को समाप्त हुई।

खतलिंग- रुद्रा देवी यात्रा

उत्तराखंड के पांचवा धाम यात्रा के नाम से प्रचलित यह यात्रा टिहरी जनपद के उच्च हिमालय क्षेत्र में हर वर्ष सितंबरमाह में होती है।

पंवालीकांठा – केदार यात्रा

टिहरी गढ़वाल के पंवालीकांठा से रूद्रप्रयाग के केदारनाथ तक की जाने वाली 29 किलोमीटर कि यह पैदल यात्रा अगस्त-सितंबर (August-September) महीने में देवी-देवता की डोली के साथ की जाती है।

सहस्त्र ताल महाश्र यात्रा

यह यात्रा टिहरी से शुरु होकर बूढ़ाकेदार से महाश्र ताल से घुत्तु से उत्तरकाशी के सहस्त्र ताल समूह तक जाती है। देवी-देवताओं की डोली व ध्वज के साथ यात्रा भाद्रपद महीने में होती है। अपनी-अपनी सुविधानुसार किसी भी गांव-क्षेत्र से यह यात्रा शुरू होती है।

वारुणी यात्रा

उत्तरकाशी में एकदिवसीय पंचकोशी यात्रा का पौराणिक महत्त्व है। चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को इसका प्रारम्भ बेडथी में वरुणा एवं भागीरथी के संगम पर स्नान के उपरांत शुरू होती है। यात्रीगण यहां के यहां से गंगाजल लेकर वरुणा के प्रवाह पथ सेहोकर वरुणावत पर्वत की ओर चल पड़ते हैं। यह यात्रा 20 किलोमीटर पैदल की है।

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