उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध व्यक्ति #16 : टिंचरी माई

प्रारंभिक जीवन

पौड़ी गढ़वाल के थलीसैण क्षेत्र के मज्ंयुर गांव के राम दत्त नौटियाल के घर 1917 में जन्मी दीपा नौटियाल की जीवन यात्रा उत्तराखण्ड की नारी के उत्पीड़न सामाजिक कुरीतियों तथा विसंगतियो के विरुद्ध लड़ी गई लड़ाई और साहस का अनुकरणीय उदाहरण है। बीसवीं सदी के आरम्भ मे जन्मी दीपा दो वर्ष में ही मातृ विहीन हो गई और पांच वर्ष की आयु में पिता का प्यार भी नही रहा। गांव के एक चाचा ने दीपा का लालन-पालन किया। उन्हें लोग ठगुली देवी भी कहते थे | अपने अशिक्षित होने की पीड़ा माई को हमेशा सताती रही। सात वर्ष की मांई का विवाह गवांणी गांव के गणेश राम से हुआ। ससुराल में एक दिन बिता कर मांई अपने पति के साथ रावलपिंडी चली गई।

वैराग्य और सार्वजनिक जीवन (इच्छाधारी माई )

पति हवलदार गणेश राम पत्नी को बड़े लाड़ प्यार के साथ रखते थे। जब वे द्वितीय विश्व युद्ध में गये तो लौट कर नही आये। उनकी मृत्यु के बाद एक अंग्रेज अफसर की देख-रेख में मांई एक सप्ताह तक रही। अधिकारी ने मांई को बुला कर उसके पति का सारा हिसाब-किताब समझा कर उसके सब रुपये अंग्रेज अफसर को सौंप, उस अफसर के साथ सम्मान कालौ डाडां (लैंसडोन) छावनी भेज दिया। मांई तब मात्र 19 वर्ष की थी। मायके से असहाय ससुराल से तिरस्कृत अपने भविष्य के प्रति चिंतित माई ने अपना मार्ग स्वयं बनाने का उसी रात निश्चय कर लिया था। अंग्रेज अधिकारी के साथ अकेले सफर करके लैंसडोन पहुंचने वाली माई अति निर्भिक स्वभाव की थी।

माई फिर वहां से अकेली निकल कर लाहौर पहुंच गई। वहां एक मन्दिर में कुछ दिन रह कर एक सन्यासिन से माई ने दीक्षा ली और तब से वह दीपा से इच्छागिरी माई बन गई और वीतराग एवं निस्पृह जीवन जीने लगी।

अपनी गुरु के आग्रह पर 1947 में माई को हरिद्वार आना पड़ा। लौटकर वे नौ माह काली मन्दिर चण्डी घाट में रही। वहां माई ने ढौंगी साधुओं के दुष्कर्म देखे जैसे मछली मार कर खाना, गंगा स्नान के समय मछलियां छिपा कर लाना, दिन भर सुल्फा, गांजा नशा करके निठल्ले पड़े रहना

अंततः माई इधर-उधर घूम कर सिगड्डी भाबर आ गई और घास फूस की झोपडी बना कर रहने लगी। वहां पानी का बड़ा अभाव था। महिलाओं को बहुत दूर से पानी लाना पड़ता था। मांई को यह सहन नही था। वह अधिकारीयों से मिली, डिप्टी कलेक्टर से मिली, किन्तु कुछ नही हुआ। मांई दिल्ली पहुंच गई और प्रधानमंत्री नेहरू जी की कोठी के फाटक पर धरना दे कर बैठ गई। नेहरु जब कार्यालय जा रहे थे तो मांई उनकी गाड़ी के सामने खड़ी हो गई। पुलिसवाले उन्हे खींचकर हटाने लगे। नेहरु जी गाड़ी से नीचे उतरे मांई ने गांव की बहु-बेटियों की विपदा उन्हें सुना दी। मांई का सारा बदन उस दिन बुखार से तप रहा था।

नेहरु ने उस समय मांई का ईलाज अस्पताल में कराया और वापस लौटते समय मांई को कुछ कपड़े भी दिये और कहा ‘‘अब जाओ जल्दी पानी मिल जायेगा’’। थोड़े ही दिनो बाद सिगड्डी-भाबर में पानी आ गया। टिंचरी माई यानी इच्छागिरी माई की कुटियां एक आदमी ने पटवारी से मिल कर हड़प ली किन्तु मांई अपने कारण लड़ी नहीं और वहां से मोटा-ढाक चली गई। मोटा-ढाक में एक अध्यापाक मोहन सिंह ने मांई को रहने के लिये एक कमरा दिया। माई वहीं रहने लगीं। मास्टर चाहते थे कि वहां एक स्कूल बने।

मांई ने इस बात को बड़ी गम्भीरता से लिया और ना जाने कब एक ट्रक ईटें वहां लाकर डाल दी। मांई अपने पैसों से सरिया, सिमेण्ट लाती रही तथा उसी दौरान प्राईवेट मिडल स्कूल बन कर तैयार हो गया। पहले तो यह स्कूल छात्राओं के लिए ही बना, बाद में यह हाई स्कूल हो गया। इस स्कूल का नाम मांई ने अपने पति स्वः गणेश राम के नाम पर रखवाया ।

मोटा-ढाक में अपना कार्य पूरा करके मांई बदरीनाथ धाम चली गई। वहां नौ वर्ष रही। वहां रावल ने इनके आवास ओर भोजन की व्यवस्था की। बदरीनाथ के बाद वे चार वर्ष केदारनाथ में रही। किन्तु वहां के देव दर्शन में अमीर गरीब का भेदभाव और दिन प्रतिदिन बढती अस्वच्छता और अपवित्रता को देख कर माई खिन्न हुई।

टिंचरी माई

वहां से मांई फिर पौड़ी आ गई। वहां 1955-56 के आस पास एक दिन डाकखाने के बरामदे में मांई सोच रही थी। सामने शराब व्यापारी मित्तल की टिंचरी(शराब) की दुकान थी। जहां एक आदमी टिंचरी पीकर लड़खड़ाता हुआ महिलाओं की और अभद्रता से इशारे करने लगा। फिर अचेत होकर नीचे गिर पड़ा।

डिप्टी कमिश्नर को चेतावनी देने के पश्चात मांई मिटृी का तेल और माचिस की डिबिया लाई और बन्द दरवाजा तोड़ कर अंदर चली गई। टिंचरी पी रहे लोग भाग खड़े हुए और भीड़ जुट गई। दुकान जल कर स्वाहा हो गई। इस घटना की व्यापक प्रतिक्रिया हुई। तब से इच्छागिरी मांई टिंचरी मांई के नाम से विख्यात हो गई। 19 जून, 1992 को माई की दैहिक लीला समाप्त हुई।

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