उत्तराखण्ड की धरोहर : गैलोगी जलविद्युत संयंत्र

उत्तराखंड राज्य का  पहला पावर हाउस गैलोगी, देश की ऊर्जा इतिहास एवं राज्य की गौरवशाली धरोहर है । इस बिजली घर सेमसूरी के बर्लोगंज और दून घाटी के अनारवाला क्षेत्र आज भी रोशन है। मसूरी देश में बिजली पैदा करने वाला दूसरा एवं उत्तर भारत का पहला शहर है | सन 1906-07 में जब दिल्ली मुंबई और कोलकाता जैसे आज के आधुनिक महानगरों में लालटेन और मशाले जलाकर रोशनी की जाती थी, तब से ही मसूरी में बिजली का प्रकाश जगमगाने लगा था|

गैलोगी विद्युत् संयंत्र का एक पुराना चित्र

उस समय समस्त भारत में कुल चार जल विद्युत ग्रहों की परिकल्पना की गई थी जिनमें मैसूर ,दार्जिलिंग ,चंबा (हिमांचल)के साथ साथ गैलोगी जल विद्युत गृह भी सम्मिलित था | इनमें से अब केवल गलोगी का संयंत्र ही चालू हालत में है |

इस संयंत्र के निर्माण में 7 लाख 50 हजार रुपए का खर्च आया | सबसे पहले बड़े जनरेटर और संयंत्रों को देहरादून नगर से गढ़ी-डाकरा इलाके से एक कच्ची सड़क बनाकर बैलगाड़ियों के जरिए गलोगी तक पहुंचाने का निर्णय लिया गया, लेकिन विस्तृत सर्वेक्षण के बाद इसमें अधिक धन वा समय की बर्बादी को ध्यान में रखते हुए इसे स्थगित कर दिया था और वर्तमान मसूरी देहरादून मोटर मार्ग जो उन दिनों बैलगाडी मार्ग था ,उसी के जरिए ही भरी सामग्री कार्यस्थल तक पहुंचाई गई, सन 1907 में अंततः क्यारकुली तथा भट्टा में बने छोटे जलाशयों से 16 इंची पाइप लाइनों से पहुंची जलधाराओं ने इंग्लैंड से निर्मित विशालकाय टरबाइन मशीनों को चलाना शुरु किया ,और मसूरी तथा देहरादून के नागरिकों पहली बार बिजली की रौशनी देखी। |  9 नवंबर 1912 को गैलोगी विद्युत गृह ने देश में प्रथम जल विद्युत् गृह होने का मुकाम हासिल किया | सन 1920 तक मसूरी के अधिकतर बंगलों- होटलों तथा स्कूल से लैंप उतार दिए गए थे और उनकी जगह बिजली के चमकीले बल्बों ने ले ली थी | गैलोगी के बिजली घर में लगभग 600 से अधिक गोरे काले विशेषज्ञ, तकनीशियन, कारिंदों,मजदूरों, ढुलानी मजदूरों ने काम किया | सन 1900 में देहरादून पहुंची रेल ने इस परियोजना को गति देने में सबसे बड़ी भूमिका अदा की थी, जिससे कि इंग्लैंड से पानी के जहाजों के जरिए, मुंबई पहुंची भारी मशीनें और टरबाइनों को तीव्रगति से देहरादून पहुंचाया गया | मसूरी पालिका पूरे 70 साल गलोगी बिजली ग्रह की स्वामी रही | सन 1976 को उत्तर प्रदेश विद्युत परिषद ने  बिजली घर सहित पालिका के समस्त विद्युत उपक्रम अधिग्रहित कर लिए थे | उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद इसका नियंत्रण उत्तराखंड जल विद्युत निगम को दिया गया |

इस बिजलीघर की क्षमता 3 मेगा वाट है और इसमें पिछले 112 सालों से लगातार उत्पादन हो रहा है |

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