नीतिशास्त्र #4 : उत्तराखंड पीसीएस हेतु

जटिल परिस्थितियों में नैतिक निर्णय करने में नीतिशास्त्र के विभिन्न आयाम सहायक होते हैं| ऐसे आयाम हैं – उपयोगितावादी सिद्धांत, अधिकारवादी सिद्धांत, न्यायवादी सिद्धांत, सर्वहितवादी सिद्धांत और सद्‌गुणवादी सिद्धांत|

उयोगितावादी सिद्धांत

उपयोगितावाद की अवधारणा 19वीं शताब्दी में जेरेमी बेन्थैम और जॉन स्टुअर्ट मिल ने दी थी| इस सिद्धांत के अनुसार नैतिक कृत्य वे कृत्य हैं जो दुःख के ऊपर सुख को सर्वाधिक संतुलित रूप से अधिष्ठापित करते हैं| इस सन्दर्भ में आंतक के विरुद्ध छेड़ा गया युद्ध नैतिकतापूर्ण है क्योंकि यह निर्दोष लोगों की मृत्यु और शारीरिक क्षति को रोकने का प्रयास करता है|

अधिकारवादी सिद्धांत

यह सिद्धांत इमैनुअल कांट आदि के दर्शन से उत्पन्न है और स्वतंत्र इच्छा से किये गए कृत्यों पर आधारित है| इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को यह नैतिक अधिकार है कि वह अपने जीवन के साथ क्या करना चाहता है, उसका निर्णय वह स्वयं करे| अतः कोई भी वह कृत्य जो व्यक्ति के इस नैतिक अधिकार का सम्मान करता है वह नैतिकतापूर्ण है| यहाँ मानव साध्य है, किसी अन्य हेतु साधन नहीं | अतः मानव की तर्कशक्ति और उसकी गरिमा उसके अधिकारों का स्रोत है |

न्यायवादी सिद्धांत

इस सिद्धांत का मूल स्रोत अरस्तू और अन्य यूनानी दार्शनिकों का वह दर्शन है जिसके अनुसार सभी समान व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार ही होना चाहिए| इस सिद्धांत में इसकी परख की जाती है कि किया गया कृत्य कितना न्यायपूर्ण है और क्या वह पक्षपात अथवा भेद-भाव तो नहीं करता है| इस सिद्धांत की मूल भावना यह है कि नैतिकतापूर्ण कृत्य सभी प्राणियों से समानतापूर्वक तथा न्यायपूर्वक व्यवहार करता है|

सर्वहितवादी सिद्धांत

यह सिद्धांत भी प्लेटो, अरस्तू और सिसरो की रचनाओं से ही उत्पन्न है| इस सिद्धांत की मूल भावना यह है कि नैतिकतापूर्ण कृत्य वे कृत्य हैं जिनसे सभी व्यक्ति का भला होता है|

सद्‌गुणवादी सिद्धांत

इस सिद्धांत के अनुसार कुछ ऐसे सद्‌गुण होते हैं जिनसे मानवता का पूर्ण विकास होता है तथा कोई भी कृत्य नैतिकतापूर्ण तभी होगा जब वह इन सद्‌गुणों के अनुरूप होगा| ऐसे मानवीय सद्‌गुण हैं – ईमानदारी, साहस, दया उदारता, सहिष्णुता, प्रेम, निष्ठा, न्यायपूर्णता, आत्म-संयम, बुद्धिमत्ता आदि|

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