उत्तराखंड का इतिहास #2 : प्राचीन राजवंश

कुणिन्द शासक

कुणिन्द राजवंश प्राचीन हिमालय, उत्तराखंड और उत्तर भारत में लगभग दूसरी-तीसरी शताब्दी के आस-पास के शासक थे। कुणिन्दों का साम्राज्य मूलतः गंगा, यमुना के उपजाऊ क्षेत्र के आस-पास था।

प्रारंभ में कुणिन्द लोग मोर्यों के अधीन थे। कुणिन्द वंश का सबसे शक्तिशाली शासक अमोघभूति था। इन्होने रजत और कास्य की मुद्राओं का प्रचालन किया जिसमे देवी और मृग अंकित थे।अमोघभूति के मृत्यु के बाद शकों ने इनके मैदानी भागों पर अधिकार कर लिया।

शक शासन

शक प्राचीन मध्य एशिया में रहने वाले जनजातियों का एक समूह था। जो बाद में भारत, चीन, ईरान, यूनान आदि देशो में जाकर बसने लगे। शकों के भारत में प्रवेश के बाद, अपना बहुत बड़ा साम्राज्य भारत में स्थापित किया । आधुनिक भारतीय राष्ट्रीय कैलेंडर ‘शक संवत’ कहलाता है।

कुमाऊं क्षेत्र में शक संवत का प्रचलन तथा सूर्य मन्दिरों मूर्तियों की उपस्थिति शकों के शासन की पुष्टि करते हैं, अल्मोड़ा के कोसी के पास स्थित कटारमल सूर्य मंदिर स्थित हैं। शकों के शासन के बाद तराई भागों में कुषाणों ने अपना अधिकार स्थापित किया। 

कुषाण  शासक

कुषाण शासन के कुछ अवशेष वीरभद्र (ऋषिकेश), मोरध्वज (कोटद्वार) और गोविपाषाण (काशीपुर) से प्राप्त हुए हैं। कुषाण शासकों के पतन के समय यहाँ पर कुछ नये राजवंशों का शासन था, जिन में योधेय शासक प्रमुख थे।

  • 5 वीं शताब्दी में नागों ने कुणिन्द राजवंश का अंत कर उत्तराखंड पर अधिकार कर लिया।
  • 6 वीं शताब्दी कन्नोजों के मौखरि राजवंश ने नागों की सत्ता समाप्त कर उत्तराखंड पर अधिकार किया।
  • मौखरि राजवंश के अंत के बाद मौखरि राज्य हर्षवर्धन के अधीन हो गया।

कार्तिकेयपुर (कत्यूरी) राजवंश

कत्यूरी राजवंश शक वंशावली के माने जाते है, लेकिन इतिहासकार बद्रीदत्त पांडे का मानना है, कि कत्यूरी अयोध्या से आए थे। कत्यूरीयों ने अपने राजवंश को कुर्माञ्चल कहा जो वर्तमान कुमाऊँ है।

हर्षवर्धन के मृत्यु के बाद उत्तराखंड में कार्तिकेयपुर राजवंश की स्थापना हुई, शुरू में लगभग 300 वर्षों तक इनकी राजधानी जोशीमठ (चमोली) के पास कार्तिकेयपुर नामक स्थान पर थी, बाद में इनकी राजधानी अल्मोड़ा के कत्युर घाटी में स्थित बैजनाथ बनायी गई। इस राजवंश को कुमाऊं का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश माना जाता हैं।

बागेश्वर लेख के अनुसार राजवंश के  प्रथम राजा बसंतदेव थे, तथा इसके बाद खर्परदेव थे। पाल शासक धर्मपाल द्वारा गढ़वाल पर आक्रमण करने के कारण निम्बर वंश की स्थापना हुई।

कार्तिकेयपुर राजवंश के शासन काल में ही उत्तराखंड में आदि गुरु शंकराचार्य जी का आगमन हुआ था, जिन्होंने केदारनाथ तथा बद्रीनाथ का पुनरुद्धार किया और ज्योर्तिमठ की स्थापना की।

निम्बर वंश

बागेश्वर शिलालेख के अनुसार त्रिभुवन-राज के पश्चात् एक नया राजवंश सत्ता में आया, जिससे निम्बर के नाम से जाना जाता हैI जिसकी स्थापना निम्बर ने की थी। अभिलेखों को आधार मान कर कहा जा सकता है, की निम्बर का पुत्र इष्टगण इस वंश का पहला स्वतन्त्र शासक रहा होगा, क्योंकि उनके लिए अभिलेखों में परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर शब्द प्रयोग किया गया है। इष्टगण और रानी वेगदेवी के पुत्र ललितशूर के 21वें और 22वें राज्यवर्ष के दो ताम्रपत्र पाण्डुकेश्वर में सुरिक्षत हैं। ललितशूर देव के बाद यहाँ का राजा भूदेव बना, जिस ने बोद्ध धर्म का विरोध किया।

सलोणादित्य वंश

पाण्डुकेश्वर तथा बागेश्वर ताम्रपत्रों के अनुसार निम्बर वंश के पश्चात सलोणादित्य के पुत्र इच्छटदेव ने नए राजवंश की स्थापना की।सुभिक्षराज के पाण्डुकेश्वर लेख में उसके लिए भुवन-विख्यात-दुर्मदाराति-सीमन्तिनी-वैधव्यदीक्षादान-दक्षेक गुरू: की उपाधि प्रयुक्त है। कुमायूं-गढ़वाल से प्राप्त अभिलेखों में किसी भी राजा के लिए अभी तक ऐसा विशेषण नहीं मिला है।

पाल वंश

बैजनाथ अभिलेखों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि ग्यारहवीं और बारहवीं सदी में लखनपाल, त्रिभुवनपाल, रूद्रपाल, उदयपाल, चरूनपाल, महीपाल, अनन्तपाल, आदि पाल नामधारी राजाओं ने कत्यूर में शासन किया था। लेकिन तेरहवीं सदी में पाल कत्यूर छोड़कर अस्कोट के समीप ऊकू चले गए, ओर वहाँ जा कर उन्होंने पाल वंश की स्थापना की।

मल्ल राजवंश

एटकिंसन के अनुसार नेपाली विजेता अशोकचल्ल के गोपेश्वर लेख की तिथि 1191 ई. है, लेकिन गोपेश्वर के त्रिशूल पर अंकित अशोकचल्ल की दिग्विजय सूचक लेख में कोई तिथि नहीं दी गई है। इसके विपरीत अशोकचल्ल के बोधगया से प्राप्त एक लेख में परिनिर्वाण संवत् 1813 का उल्लेख है। सिंहली परम्परा के अनुसार 554 ई. से परिनिर्वाण संवत् प्रारम्भ हुआ।

तेरहवीं सदी में नेपाल में बौद्ध धर्मानुयायी मल्ल राजवंश का अभ्युदय हुआ। बागेश्वर लेख के अनुसार 1223 ई. में क्राचल्लदेव ने कार्तिकेयपुर (कत्यूर) के शासकों को परास्त कर दिया । दुलू और जुमला से मल्ल राजवंश के अनेक लेख मिले हैं। जिनसे ज्ञात होता है कि तेरहवीं से पन्द्रहवीं सदी तक कुमायूं गढ़वाल और पश्चिमी तिब्बत में कैलाश मानसरोवर तक मल्लों का प्रभुत्व था।

आसन्तिदेव वंश

पर्वतीय लोकगाथाओं तथा अस्कोट, डोटी और पालीपछाऊं के राजघरानों की वंशावली के अनुसार आसन्तिदेव ने जोशीमठ से आकर कत्यूर पर अधिकार किया। जोशीमठ से प्राप्त गुरूपादुक नामक हस्तलिखित ग्रन्थ में आसन्तिदेव के पूर्वजों में अग्निवराई, फीणवराई, सुवतीवराई, केशवराई और बगडवराई के नाम क्रमश: दिए हुए हैं। जिन्होंने जोशीमठ से राजधानी हटाकर कत्यूर में रणचूलाकोट में स्थापित की। उसके पश्चात् कत्यूर में वासंजीराई, गोराराई, सांवलाराई, इलयणदेव, तीलणदेव, प्रीतमदेव, धामदेव और ब्रह्मदेव ने क्रमश: शासन किया

सभी इतिहासकार इस बात से एकमत हैं कि कत्यूरियों का विशाल साम्राज्य ब्रह्मदेव के अत्याचारी शासन के कारण समाप्त हुआ। एक लोकगाथा में चम्पावत के चन्दवंशीय राजा विक्रमचन्द द्वारा ब्रह्मदेव के माल-भाबर में उलझे रहने के समय लखनपुर पर आक्रमण का वर्णन मिलता है। विक्रमचन्द ने 1423 से 1437 ई. तक शासन किया। अत: ब्रह्मदेव का भी यही समय माना जाना चाहिए। विक्रमचन्द अन्त में परास्त हुआ और उसे ब्रह्मदेव की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी। इस प्रकार कत्यूरी राजसत्ता का पतन पन्द्रहवीं सदी के प्रारम्भ में माना जाता है।

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